
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती की स्वास्थ्य व्यवस्था में ‘बाबूजी’ का ‘जंगलराज’, नियमों को ठेंगा दिखा क्या अपनी कुर्सी गंवाएंगे CMO साहब?
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश
- साहब! यह ‘प्यार’ है या ‘व्यापार’? एक ही दिन में टेंडर, स्पष्टीकरण और अनुबंध का अनोखा रिकॉर्ड!
- करोड़ों के टेंडर में ‘कमीशन’ का खेल या ‘बाबूजी’ का खौफ? बस्ती स्वास्थ्य विभाग में मची खलबली।
- हाईकोर्ट की चेतावनी भी बेअसर: बेखौफ CMO ने दांव पर लगाया करियर, जांच के घेरे में ‘साहब’ और ‘बाबूजी’।
- योगीराज में अधिकारियों की मनमानी: फाइलें दौड़ती रहीं, नियम रोते रहे और ‘खास’ ठेकेदार की चांदी हो गई।
- अरे ‘सीएमओ’ साहब! ये क्या कर दिया आपने? अपनों को उपकृत करने के चक्कर में अपने ही पैरों पर मार ली कुल्हाड़ी!
- सुपरफास्ट CMO: 24 घंटे में निपटा दी टेंडर की फाइल, क्या ओलंपिक में जाएंगे बस्ती के स्वास्थ्य अधिकारी?
- बस्ती मंडल की बड़ी खबर: जहाँ कानून खत्म होता है, वहां से ‘बाबूजी’ का दबाव शुरू होता है!
बस्ती। प्रदेश की योगी सरकार भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ का ढोल पीट रही है, लेकिन बस्ती जनपद के स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि यहाँ नियम-कानून नहीं, बल्कि ‘बाबूजी’ का दबाव चलता है। ताजा मामला मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) डॉ. राजीव निगम से जुड़ा है, जिन्होंने एक ‘खास’ ठेकेदार को उपकृत करने के चक्कर में अपने पूरे करियर को ही दांव पर लगा दिया है। सवाल यह है कि आखिर उस रसूखदार ‘बाबूजी’ के पास ऐसी कौन सी जादुई छड़ी है, जिसके आगे साहब ने घुटने टेक दिए?
एक ही दिन में ‘खेल’ खत्म: नियम ताक पर, भ्रष्टाचार चरम पर
हैरानी की बात यह है कि जो काम महीनों की कानूनी प्रक्रिया के बाद नहीं हो पाता, उसे CMO साहब ने महज 24 घंटे के भीतर अंजाम दे दिया। 30 मार्च 26 को वित्तीय वर्ष खत्म होने से ठीक एक दिन पहले ‘जय कंस्ट्रक्शन’ के ठेकेदार जनेश्वर चौधरी के नाम अनुबंध कर दिया गया।
साहब की मेहरबानी का आलम देखिए:
- 30 मार्च: अनुबंध (Agreement) होता है।
- 30 मार्च: ठेकेदार से स्पष्टीकरण लिया जाता है।
- 30 मार्च: 10 फीसदी अतिरिक्त सुरक्षा राशि (Security Deposit) जमा करा ली जाती है।
क्या यह चमत्कार नहीं है? जिस टेंडर पर 14 फीसदी से अधिक ‘बिलो’ होने के कारण अनुबंध का अधिकार ही नहीं था, उस पर साहब ने रातों-रात मुहर लगा दी।
हाईकोर्ट की दहलीज पर मामला, फिर भी बेखौफ अधिकारी
शिकायतकर्ता दीपक कुमार मिश्रा ने इस मामले को लेकर पहले ही चेतावनी दी थी और मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट तक जा चुका है। बावजूद इसके, CMO साहब ने ‘गार्गी इंटरप्राइजेज’ के टेंडर को निरस्त कर जनेश्वर चौधरी को ‘तोहफा’ दे दिया। स्वास्थ्य विभाग के गलियारों में चर्चा है कि यह सब एक सत्तापक्ष के ‘बाबूजी’ के इशारे पर हो रहा है।
करोड़ों का वारा-न्याय: जांच के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति?
जिला अस्पताल, महिला अस्पताल और टीबी अस्पताल में मरम्मत और लघु निर्माण के नाम पर करोड़ों का बंदरबांट होने की तैयारी है। कमिश्नर के आदेश पर एडी हेल्थ इस मामले की जांच कर रहे हैं, लेकिन चर्चा है कि वह भी ‘बाबूजी’ के रसूख के आगे सुस्त पड़ गए हैं। तीन महीने बीत जाने के बाद भी जांच रिपोर्ट का न आना विभागीय मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
यक्ष प्रश्न: क्या जवाब देंगे साहब?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अनुबंध वित्तीय वर्ष 2025-26 के आखिरी दिन हुआ, तो काम और भुगतान 2026-27 में कैसे होगा? क्या डॉ. राजीव निगम कोर्ट में इस ‘अवैध’ मेहरबानी का तार्किक जवाब दे पाएंगे?
बड़ा सवाल: > “कोई भी अधिकारी किसी नेता के ‘जातीय ठेकेदार’ के लिए इतना बड़ा रिस्क क्यों लेगा? क्या इसके पीछे सिर्फ ‘दबाव’ है या फिर नोटों की वो गड्डियां, जिनकी खनक ने साहब की ईमानदारी की चमक को धुंधला कर दिया है?”
अब देखना यह होगा कि शासन इस खुलेआम हो रही लूट पर कब संज्ञान लेता है या फिर बस्ती का स्वास्थ्य विभाग यूं ही ‘बाबूजी’ और ‘साहब’ की जुगलबंदी में लूटता रहेगा।


















